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    कंगना बनाम संजय रॉउत ।

    कंगना बनाम संजय रॉउत ।

    अपराध घटित हो चुका है और अब जनता ने आंखे खोल दी है। नुकसान का आंकलन हो रहा है। उच्च स्तर पर स्थिति का मूल्यांकन हो रहा है। सबसे बड़ी जनता अदालत ने संज्ञान ले लिया है। भागमभाग शुरू हो गयी है। कॉंग्रेस अपने आपको मूक दर्शक बनकर स्थिति को देखना चाहती है। श्री शरद पवार ने मुख्य मंत्री से अपनी नाराजगी जता दी है। कुछ दल कंगना से हमदर्दी जता रहे है। लेकिन क्या इस सबसे कहानी का पटाक्षेप हो जाएगा?
    क्या उगले गए जहरीले शब्द वापस हो जाएंगे? घटनाओं की चेन स्पष्ट करती है कि बदले और जिद्द की कार्यवाही हुई है। मुम्बई नगर कारपोरेशन किसके अधीन कार्य करता है। क्या उसे वही निश्चित दिन सब आदेशो और प्रकिर्या को धत्ता देते हुए तोड़फोड़ की कार्यवाही के लिये मिला था। दुनिया ने देखा कि किस प्रकार कर्मचारियों ने नियम विरुद्ध कार्यवाही करते हुए घर के अंदर भी गैर कानूनी तोड़फोड़ की। स्पष्ट है कि बिना उच्च स्तरीय आदेशो के ऐसा ध्वस्तीकरण नही किया जा सकता। वह भी राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त एक पदम श्री महिला के संदर्भ में। अब अगर न्यायालय के आदेश पर क्षति पूर्ति हो भी जाय तो क्या हुए राष्ट्रीय नुकसान की भरपाई हो सकेगी। क्या कंगना के सम्मान की भरपाई हो सकेगी ?पूरे प्रकरण पर हुए सरकारी खर्च का कौन जिम्मेदार होगा? मैंने पहले ही शंका जाहिर की थी कि इसका असर दूसरे राज्यो में भी देखने को मिल सकता है। हिमाचल ने अपना हिमाचल राग अलापना शुरू कर दिया है। तो क्या प्रदेश सरकारों को अपने नागरिकों की रक्षा करने के लिये अपनी पुलिस को दूसरे राज्यो में भी भेजना पड़ेगा। सोचने की बात है कि क्या स्थिति हो सकती है।
    जनता को मूर्ख बनाने के लिये अपने को अलग होने के बयान दिए जा रहे है लेकिन अंदर गुब्बार उबल रहा है। हनन प्रस्ताव, ड्रग की जांच और पुलिस रिपोर्ट्स जैसे कारनामे डराने और दबाव बनाने के लिए किए जा रहे है ऐसे में एक महिला कहाँ तक प्रतिरोध करेगी।अंत मे हारकर अपना बिस्तर बांधकर अपने घर को लौट जाएगी। यही विडंबना है हमारे देश की निरंकुश क्षेत्रीय राजनीति की। यह वीर महिला केवल किस्से कहानियों तक सीमित रह जायेगी। फिर कोई सुदर्शन टीवी या कंगना रणौत पैदा होगी और मर जाएगी या खो जाएगी राजनीति के गर्त में। मित्रो यह अंतहीन कहानी आखिर कब तक चलती रहेगी? कब तक इस देश के चंद राजनीतिज्ञ देश को अपनी उंगलियों पर नचाते रहेंगे? आखिर कब हमारे देश की संस्कृति और संविधान को सच्चा सम्मान प्राप्त होगा। अकेले प्रधान मंत्री भी कब तक सोचते और बोलते रहेंगे। आखिर में भी जनता को ही कुछ सोचना होगा। इसलिये प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आना चाहिये और अपने यशश्वी प्रधान मंत्री के साथ मिलकर ऐसी शक्ति का निर्माण करे जो इस देश को कुपात्रों से मुक्त कर देश मे राम राज्य स्वरूपा शासन स्थापित कर सके।
    ललित मोहन शर्मा
    बिल्ड इंडिया फोरम

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