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    पति की मौत या तलाक़ की वजह से पति-पत्नी के बीच जुदाएगी होने पर स्त्री के लिए इद्दत वाजिब (फर्ज़) प्रथा का विश्लेष्ण- अशोक बालियान

    पति की मौत या तलाक़ की वजह से पति-पत्नी के बीच जुदाएगी होने पर स्त्री के लिए इद्दत वाजिब (फर्ज़) प्रथा का विश्लेष्ण- अशोक बालियान


    हम सामाजिक विषयों पर लिखते रहते है और हमारे लिए दुःख-दर्द और सरोकार कहीं ज़्यादा मायने रखते हैंl हमारा इद्दत (विधवा या तलाक़शुदा स्त्री की प्रतीक्षा की अवधि) पर लिखने का उद्देश्य है कि इद्दत के रिवाज या प्रथा का विश्लेष्ण होना चाहिए, क्योकि हमारी मुस्लिम समाज की स्त्रियाँ इस रिवाज या प्रथा से जूझ रही है। स्त्रियों के लिए असली मुद्दा आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा का है।
    एक शोधार्थी की तरह लिखने से पहले हम अपनी क्षमता और समझ के मुताबिक़ पूरी मेहनत करते हैl एक लेखक होने के नाते हमने अपनी बात बिना किसी भेदभाव के स्त्री के हक़ में कही हैl लेखक का एक दायित्व यह भी होता है कि वह निरपेक्ष हो कर अपने विवेकानुसार गलत और सही में फ़र्क करेl क्या इद्दत के अन्दर स्त्री को एक अजनबी व गैर औरत की तरह रखा जाना उचित है।
    मुस्लिम विधि में निक़ाह कोई कोई संस्कार नहीं है बल्कि एक संविदा (समझौता) है, लेकिन भारत में भी आमतौर पर काफी हद तक मुस्लिम विवाह को भी “हिंदू धर्म में विवाह को संस्कार मानने” की तरह एक संस्कार माना गया है। अर्थात विवाह स्थाई सम्बन्ध की धारणा के साथ सम्पन होता है।
    शरीअत के अनुसार इद्दत वह अवधि (पति की मृत्यु के बाद 4 माह 10 दिन व पति से तलाक के बाद इद्दत 3 माह 10 दिन) है, जिसमे जिस स्त्री के विवाह का पति की मृत्यु या तलाक द्वारा विच्छेद हो गया हो, उसे एकांत में रहना और दूसरे पुरुष से विवाह न करना अनिवार्य है। बुजुर्ग महिलाएं भी खामोशी के साथ इद्दत के रिवाज के आगे घुटने टेक देती है, और इसे गुजारने का फैसला कर लेती है। शरीयत में मोहम्मद पैगंबर द्वारा किए हुए काम के शब्द शामिल है।
    वहीं, गर्भवती महिला की इद्दत अवधि बच्चे को जन्म देने के बाद समाप्त होती है। महिला इस अवधि के दौरान अपने पिता, संगे भाई व बेटे के सामने आ सकती है। इस अवधि के दौरान उसे पर्दे में रहना होता है। इद्दत पूरा करने के बाद वह फिर से निकाह कर सकती है।
    इद्दत का उद्देशय यह निश्चित करना होता है कि क्या स्त्री पति से गर्भवती है अथवा नहीं, जिससे कि मृत्यु अथवा विवाह-विच्छेद के पश्चात् उत्पन्न हुई संतान की पैतृकता में भ्रम न पैदा हो। किसी वजह से शौहर के घर इद्दत गुज़ारना मुश्किल हो तो स्त्री अपने मैके (पिता के घर) या किसी दूसरे घर में भी इद्दत गुज़ार सकती है।
    पुरुषों द्वारा ‘स्त्री-धर्म’ के नाम पर उसके चारों तरफ़ जिस तरह वर्जनाओं की कंटीले तारों की बाड़ खड़ी कर दी गयी है, उसे वह चाह कर भी नहीं लांघ पाती हैl धर्म में दिए गए निर्देशों की व्याख्याओं को पुरुष अपनी सुविधा और मर्ज़ी से तय करना लगा हैl सच तो यह है कि स्त्रियाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं पुरुषों के तय किये गए निर्देशों के अनुसार जी रही हैंl
    दुनिया में बदलते समय, बदलते समाज, बदलते परिवेश और शिक्षा के बढ़ते महत्त्व के बीच भारत की मुसलिम महिलाओं ने भी बंदिशों की बेडि़यों को झकझोरना शुरू कर दिया है और अब कुछ महिलाएं इद्दत की इस अवधि, इस अवधि में कोई काम न करना व इसके एकान्तवाद के तरीके को अनुचित बताते हुए इसमें बदलाव की मांग कर रही है।
    इस प्रकार हम कह सकते है कि इद्दत इस्लाम की एक सामाजिक व्यवस्था है। और इसको बदला जा सकता है। अब तो महिला के यूरिन में मौजूद एचसीजी की मात्रा से पता चल जाता है कि वह गर्भवती है या नहीं। इसलिए स्त्री के पति की मौत या तलाक़ की वजह से पति-पत्नी के बीच जुदाएगी होने पर स्त्री गर्भवती है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए इद्दत पर बैठने की जरूरत नहीं है।
    इसलिए इद्दत की अवधि की रिवाज ‘लैंगिक न्याय’ (जेंडर जस्टिस) व मानवीय मूल्यों के सिद्धांतों के खिलाफ है। और अधिकतर महिलाये भी इद्दत की इन रिवाजों से गुजरना नहीं चाहती है, लेकिन वे रिवाज के दबाव में इसको करती आ रही है। इस रिवाज में सुधार होना चाहिएl

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