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    बीसीसीआई उपाध्यक्ष महिम वर्मा ने अपने विरोधियों को पटककर मारा,दमदार और शानदार वोटो से जीत गए सीएयू सचिव का चुनाव,पढ़े साम-दाम-दंड-भेद के चक्रव्यूह को कैसे भेदा महिम ने

    -मोहम्मद सलीम सैफ़ी- महिम वर्मा ने सी.ए.यू (उत्तराखंड) के सचिव पद के चुनाव में बाहुबलियों को पटक डाला है ,16 वोटों के भारी अंतर से चुनाव जीतकर एक बार फिर सचिव निर्वाचित होकर वर्मा ने अपना दबदबा जगज़ाहिर कर दिया है ,वर्मा परिवार के त्याग,सादगी और ईमानदार छवि पर सदस्यों का जमकर समर्थन मिला,भाजपा,कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों से ताल्लुक रखने के बावजूद विभिन्न विचारधाराओ वाले सदस्यों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उत्तराखंड क्रिकेट की बेहतरी के लिए वोट किया हालांकि इस चुनाव में वर्मा गुट के विरुद्ध जमकर षड्यंत्र रचे गए,साम-दाम-दंड-भेद की नीति और पानी की तरह पैसा खर्च करने के बावजूद विरोधियों को मुँह की खानी पड़ी,शायद ही कोई ऐसा कुकर्म बचा हो जो वर्मा गुट को घेरने और पटखनी देने में कोई कसर छोड़ता हो,उत्तराखंड क्रिकेट के मान,सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़े इस चुनाव में आखिर पी.सी.वर्मा की सादगी भरी स्वच्छ,पारदर्शी, ईमानदार और कर्मठ कार्येकर्ता की छवि ने महिम वर्मा को शानदार जीत दिलाई हालाकि महिम वर्मा का जुझारू, मेहनती और ईमानदार होना भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है।

    महिम वर्मा को कुल 32 वोट मिले जबकि उनके 5 समर्थको के वोटो को अमान्य घोषित कर दिया गया और एक वोट को वोटिंग अधिकार से वंचित होना पड़ा,धीरज खरे को नैनीताल जिले के प्रतिनिधि के तौर पर वोट करना था मगर उन्हें विरोधियों ने मताधिकार से वंचित करा दिया। पृथ्वी सिंह नेगी,अवनीश वर्मा,राजीव जिंदल और संजय गुसांई सहित वो तमाम सदस्य चुनाव से ठीक पहले एकजुट हो गए जो कभी भी शायद एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा हो,ये सब कभी महिम वर्मा के पिता पीसी वर्मा के हक़ में आवाज़ बुलंद किया करते थे मगर न जाने इन्हें किसी की बुरी नज़र लग गई, क्यों,ऐसा क्या हो गया कि ये लोग वर्मा विरोधी लॉबी के साथ ख़ड़े नज़र आये और चुनाव की नौबत आ गयी,सूत्रों के मुताबिक धीरज खरे वर्मा लॉबी की तरफ़ से सचिव पद के सबसे सशक्त उम्मीदवार माने जा रहे थे,धीरज भंडारी और अवनीश वर्मा का नाम भी सचिव पद के लिए वर्मा लॉबी की तरफ़ से विचाराधीन था क्योंकि महिम वर्मा चाहते थे कि वो बीसीसीआई उपाध्यक्ष के तौर पर उत्तराखंड को ज़्यादा से ज़्यादा सहूलियतें और फण्ड दिलाने का काम करेंगे और इनमें से कोई एक सचिव के तौर पर उत्तराखंड में क्रिकेट का साम्राज्य स्थापित करेगा मगर कुछ सदस्यों के मन मे पनप रही महत्वकांक्षा ने उत्तराखंड क्रिकेट को होने वाले उन तमाम लाभो को अपनी इच्छाओं की बलि चढ़ा दिया जो महिम वर्मा के बीसीसीआई उपाध्यक्ष रहते सम्भव है यानी बीसीसीआई उपाध्यक्ष और सीएयू सचिव के तालमेल से मिलने वाले लाभो को कुछ सदस्यों ने तिलांजलि देने का काम किया है । अपने समर्थकों को सचिव बनता न देख और षडयंत्रकारियो के नापाक इरादों को भांपते हुए महिम वर्मा ने एक बड़ा फैसला लिया व अपने परिवार के त्याग और बलिदान के इतिहास को दोहराते हुए सचिव पद का चुनाव लड़ने का फैसला किया,उसके लिए भले ही महिम को बीसीसीआई के उपाध्यक्ष जैसा भारी भरकम पद कोई न त्यागना पडे,उत्तराखंड में क्रिकेट को बचाने के लिए महिम वर्मा ने न केवल बीसीसीआई उपाध्यक्ष के भारीभरकम पद को त्यागने की इच्छाशक्ति से सभी सीएयू सदस्यों को अवगत करा दिया बल्कि बीसीसीआई प्रबंधन को भी स्पष्ट बता दिया कि उत्तराखंड में क्रिकेट को बचाने के लिए अगर उन्हें बीसीसीआई उपाध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ेगा तो छोड़ देंगे लेकिन किसी भी कीमत पर सीएयू पर ऐसे किसी भी व्यक्ति को सचिव की कुर्सी पर काबिज़ नही होने देंगे जो उत्तराखंड में क्रिकेट को तहस नहस कर दे या किसी भी ऐसे गरीब और टेलेंटेड बच्चे का हक़ मार दे जो भारतीय क्रिकेट का हीरो बन सकता हो,बीसीसीआई से मिलने वाले किसी भी फण्ड पर गिद्ध नज़र रखने वाले षडयंत्रकारियो को रोकने के लिए महिम वर्मा ने भले ही खुद चुनाव लड़कर,जीतकर ये जता दिया हो कि वो अपने पिता पीसी वर्मा के 40 सालो के त्याग को व्यर्थ नही जाने देंगे भले ही उन्हें दुनिया के सबसे ताक़तवर और धनी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष का भारी भरकम पद ही क्यो न छोड़ना पड़े,महिम वर्मा के इसी त्याग और जज़्बे का सम्मान करते हुए सीएयू के ज़्यादातर सदस्यों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जमकर समर्थन दिया और 18 वोटो के बड़े अंतर से जीत दिला दी,महिम को कुल 32 वोट मिले जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी संजय गुंसाई को मात्र 14 वोटों पर संतोष करना पड़ा,6 वोट अमान्य घोषित हुई और धीरज खरे के रूप में नैनीताल को वोटिंग अधिकार से वंचित होना पड़ा,हालाकि इस बात में कोई दो राय नही है कि महिम वर्मा को अब 45 दिनों में ये तय करना होगा कि ग्लैमर और दौलत से भरपूर बीसीसीआई के उपाध्यक्ष को चुने या फिर अपने वर्मा परिवार के त्याग,तपस्या, सादगी,ईमानदारी और कर्मठता से भरे गौरवशाली इतिहास के अनुकूल किसी भी लालच को त्यागकर सीएयू के सचिव की कांटो भरी, संघर्षभरी और अभावभरी ज़िम्मेदारी को निभाये अगर वर्मा ऐसा करते है तो इस बात में कोई दो रॉय नही की उत्तराखंड क्रिकेट कभी भी उन सीएयू सदस्यों को माफ़ नही करेगा जो षड्यंत्रकारी बनकर महिम वर्मा को बीसीसीआई उपाध्यक्ष का पद छोड़ने पर मजबूर कर रहे है जिसपर रहकर महिम न केवल उत्तराखंड क्रिकेट को सुखसुविधा दिला कर एक बड़े मुकाम पर ले जा सकते है।

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