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    बिंदास ….बेबाक…बेमिसाल ..डॉ राहत इंदौरी – एक यादगार ज़िन्दगी

    “उत्तराखंड से मो सलीम सैफ़ी की खास ख़बर

    हर तारीख किसी न किसी वजह से बेहद खास होती है. 1 जनवरी 1950 का दिन भी दो चीजों की वजह से बेहद खास है. एक इसी दिन आधिकारिक तौर पर होल्कर रियासत ने भारत में विलाय होने वाले पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. वहीं इस तीरीख के खास होने की दूसरी वजह यह है कि 1 जनवरी 1950 को राहत साहब का जन्म हुआ था. वह दिन रविवार का था और इस्लामी कैलेंडर के अनुसार ये 1369 हिजरी थी और तारीक 12 रबी उल अव्वल थी. इसी दिन रिफअत उल्लाह साहब के घर राहत साहब की पैदाइश हुई जो बाद में हिन्दुस्तान की पूरी जनता के मुश्तरका ग़म को बयान करने वाले शायर हुए.

    जब राहत साहब के वालिद रिफअत उल्लाह 1942 में सोनकछ देवास जिले से इंदौर आए तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उनका राहत इस शहर की सबसे बेहतरीन पहचान बन जाएंगे. राहत साहब का बचपन का नाम कामिल था. बाद में इनका नाम बदलकर राहत उल्लाह कर दिया गया. राहत साहब का बचपन मुफलिसी में गुजरा. वालिद ने इंदौर आने के बाद ऑटो चलाया, मिल में काम किया, लेकिन उन दिनों आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था. 1939 से 1945 तक चलने वाले दूसरे विश्वयुद्ध ने पूरे यूरोप की हालात खराब कर रखी थी. उन दिनों भारत के कई मिलों के उत्पादों का निर्यात युरोप से होता था. दूर देशों में हो रहे युद्ध के कारण भारत पर भी असर पड़ा. मिल बंद हो गए या वहां छटनी करनी पड़ी. राहत साहब के वालिद की नौकरी भी चली गई. हालात इतने खराब हो गए कि राहत साहब के परिवार को बेघर होना पड़ा. जब राहत साहब ने आगे कलम थामा तो इस वाकये को शेर में बयां किया..

    अभी तो कोई तरक़्की नहीं कर सके हम लोग
    वही किराए का टूटा हुआ मकां है मिया

    राहत साहब को पढ़ने लिखने का शौक़ बचपन से ही रहा. पहला मुशायरा देवास में पढ़ा था. राहत साहब पर हाल में डॉ दीपक रुहानी की किताब ‘मुझे सुनाते रहे लोग वाकया मेरा’ में एक दिलचस्प किस्से का ज़िक्र है. दरअसल राहत साहब जब नौंवी क्लास में थे तो उनके स्कूल नूतन हायर सेकेंड्री स्कूल एक मुशायरा होना था. राहत साहब की ड्यूटी शायरों की ख़िदमत करने की लगी. जांनिसार अख्तर वहां आए थे. राहत साहबा उनसे ऑटोग्राफ लेने पहुंचे और कहा- ” मैं भी शेर पढ़ना चाहता हूं, इसके लिए क्या करना होगा’

    जांनिसार अख्तर साहाब बोले- पहले कम से कम पांच हजार शेर याद करो..

    राहत साहब बोले- इतने तो मुझे अभी  याद हैं

    जांनिसार साहब ने कहा- तो फिर अगला शेर जो होगा वो तुम्हारा होगा..

    इसके बाद जांनिसार अख्तर ऑटोग्राफ देते हुए अपने शेर का पहला मिसरा लिखा- ‘हमसे भागा न करो दूर गज़ालों की तरह’, राहत साहब के मुंह से दूसरा मिसरा बेसाख्ता निकला- ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह..’

    अवाम के खयालात को बयां करने वाले शायर

    राहत इंदौरी की सबसे खास बात यह रही कि वह अवाम के ख़यालात को बयां करते रहे. उसपर ज़बान और लहज़ा ऐसा कि क्या इंदौर और क्या लखनऊ, क्या दिल्ली और क्या लाहौर, हर जगह के लोगों की बात उनकी शायरी में होती है. इसका एक उदाहरण तो बहुत पहले ही मिल गया था. साल 1986 में राहत साहब कराची में एक शेर पढ़ते हैं और लगातार पांच मिनट तक तालियों की गूंज हॉल में सुनाई देती है और फिर बाद में दिल्ली में भी वही शेर पढ़ते हैं और ठीक वैसा ही दृश्य यहां भी होता है.

    अब के जो फैसला होगा वह यहीं पे होगा
    हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली

    आज दुनिया से उर्दू अदब का ये बेमिसाल और नायाब शायर हमेशा हमेशा के लिए खामोश हो गया और साथ में रुक गया वो अल्फ़ाज़ का अंदाज़ ए बयां करने का तरन्नुम वो मिज़ाज़ जिसके दीवाने दुनिया में करोङों थे हैं और हमेशा रहेंगे..न्यूज़ वायरस की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि

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