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    रवीश का लेखः समाज और सिस्टम के भीतर दर्द का ग़ुबार नज़र आता है।

    समाज और सिस्टम दोनों ने मिलकर लोगों के जीवन को तकलीफदेह बना दिया है। हर कोई दर्द के अंबार पर बैठा है। मेडिकल की पढ़ाई के लिए छात्रों से लाखों वसूले जाते हैं, लाखों छात्र कहीं से भी लाकर पैसे देते हैं। परीक्षा से लेकर मामूली बातों में सिस्टम की नाइंसाफ़ी लोगों के जीवन में भयंकर अराजकता पैदा कर देती है। हम उसे समेटे ख़ुशी का नकली नाटक करते रहते हैं। किसी भी मामले में यह सिस्टम लोगों को राहत नहीं देता है। वही राहत पाता है जिसकी पहुंच है या जिसके पास पैसा है। कई समस्याओं को देखकर लगता है कि इसे तो आज ही ठीक किया जा सकता है मगर किसी को ठीक करने में दिलचस्पी नहीं है। जो समस्याग्रस्त है वह चेतना से अभावग्रस्त है। लोग ख़ुश किस बात से है। अपनी अनैतिकताओं को सहेज कर आप शादी के कार्ड बांटते रहिए लेकिन भीतर भीतर दहेज़ का बोझ भी ढोते रहिए। कोई दलित मर जाता है तो हम रास्ता नहीं देते हैं। कोई दहेज़ नहीं लाती है तो हम जला देते हैं। गर्भ में बच्चियों को मार देते हैं। इस समाज को ख़ुशी का अभिशाप लग गया है। जब तक सामान्य नैतिकता की स्थापना नहीं होगी, कोई ख़ुश होगा ही नहीं।

    नेशनल हेल्थ मिशन के तहत चंडीगढ़ में 600 कर्मचारी कांट्रेक्ट पर वर्षों से काम कर रहे हैं। मेडिकल अफ़सर, इमरजेंसी मेडिकल अफसर, लेडी मेडिकल अफसर, स्टाफ, नर्स, फार्मासिस्ट। इन्हें न्यूनतम मज़दूरी से भी कम वेतन दिया जाता है। ज़ाहिर है तनाव में जीवन कटता होगा। चंडीगढ़ जैसे शहर में किसी का 8 से 12 हज़ार में क्या होगा। कर्मचारी लिख रहे हैं कि वे मानसिक तनाव में हैं। 10 साल की नौकरी होने जा रही है इनकी। अब इन्हें हटाया जाने वाला है क्योंकि भारत सरकार ने बजट नहीं दिया है। 19 अगस्त से 600 कर्मचारी हड़ताल पर हैं। ऐसा नहीं है कि ये लोग अपने मुद्दों के प्रति ईमानदार हैं। सिसक रहे हैं मगर कांट्रेक्ट मज़दूरों के सवाल पर राजनीति पर दबाव नहीं डालेंगे। राजनीति तो महान होती है प्रोपेगैंडा से और गोदी मीडिया से। आज हर स्तर के कर्मचारी और अधिकारी अपनी हैसियत और स्वाभिमान गंवा चुके हैं ।

    डेढ़ साल पहले इलाहाबाद बैंक के कर्मचारियों से ज़बरन बैंक के शेयर ख़रीदने के लिए कहा गया। इस पर ख़ूब लिखा हूं। कर्मचारियों को शेयर ख़रीदने के लिए मजबूर किया गया है। 54 रुपये की दर से जो शेयर दिए गए थे वो अब 31 रुपए का हो गया है। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में भी 6 महीने पहले 72 रुपए के भाव से शेयर दिए गए। उस समय शेयर का दाम 95 रुपये था। कहा गया कि आपको कम पर दिया जा रहा है लेकिन कर्मचारियों को दोनों के भाव का अंतर टैक्स के रूप में देना पड़ा। यानि टैक्स दिया, शेयर ख़रीदा और घाटा भी उठाया क्योंकि 72 रुपया का शेयर 60 का हो गया है। उसी तरह कारपोरेशन बैंक के कर्मचारियों को 19 रुपये की दर से शेयर बेचे गए। तब शेयर का भाव 24 रुपए का था। ज़ाहिर है दोनों के दाम में अंतर पर कर्मचारियों ने टैक्स भी दिया। आज उसका भाव है 17 रुपये। यानि घाटा ही घाटा है।

    इलाहाबाद बैंक के स्केल-1 के अधिकारियों से कहा गया कि वे 2350 शेयर ख़रीदें। 54 रुपये के भाव से शेयर ख़रीदने के लिए बैंक से 1.27 लाख का लोन लिया। बैंक ने दूसरे स्कीम में लोन दिया क्योंकि शेयर ख़रीदने के लिए लोन नहीं दे सकता। 8500 रुपये टैक्स के भी दिए। आज 31 रुपये के भाव से उसका कुल मूल्य है 73000। यानी 63,000 का घाटा हो चुका है। डेढ़ साल का ब्याज़ भी जोड़ लीजिए।

    बैंकों के भीतर के कर्मचारी जानते थे कि उनके बैंक के शेयर गिरेंगे लेकिन फिर भी मजबूर किया गया कि लोन लेकर शेयर ख़रीदें। इसके बाद भी बैंकों में कर्मचारियों के प्रभावशाली हिस्से में हिन्दू मुस्लिम का नेशनल सिलेबस चलता है। इनकी समस्या राजनीति की देन है फिर भी उन्हें इसकी समझ नहीं है कि राजनीति किस तरह की हो। इसलिए कह रहा हूं कि हर कोई अगले को भीषण दर्द दे रहा है। समाज और सिस्टम के भीतर दर्द का ग़ुबार नज़र आता है।

    (लेखक मैग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित हैं, और देश के जाने माने पत्रकार हैं)

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