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उत्तराखंड कांग्रेस में मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर महाघोटाले की आहट

क्या उत्तराखंड कांग्रेस में हो गया है कोई बड़ा घोटाला ?

क्या कांग्रेसियों ने मीडिया के नाम पर डकार लिया पार्टी का फंड ?

क्या अखबार , पोर्टल , चैनल्स होर्डिंग पोस्टर के आड़ में हो गया खेल ?

– फिरोज़ आलम –
न्यूज़ वायरस नेटवर्क

उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव की संभावनाएं एकदम खुली हुई नज़र आ रही थी। कोई कांटे की टक्कर बता रहा था तो कोई कांग्रेस की जीत के दावे भी कर रहा था। शायद यही वजह बन गयी पार्टी फंड के तथाकथित महाघोटाले की .जिसका जिक्र खुद पार्टी से जुड़े नेता , कार्यकर्त्ता और मीडिया से जुड़े लोग अब दबी जुबान ही नहीं सोशल मीडिया पर कर रहे हैं।

कुछ दिनों पहले की बात है जब पहाड़ में दो बड़ी पार्टियां आमने सामने थी .एक तरफ थे अनुभवी हरीश रावत और उनकी कोर टीम , जिसके जिम्मे था उत्तराखंड में पार्टी को सत्ता में वापस लाना तो दूसरी तरफ युवा पुष्कर सिंह धामी डटे थे अपने चंद दिनों की सरकार की उपलब्धियों के साथ , जिनके जिम्मे था रिकॉर्ड कायम कर भाजपा को जीत दिलाना।

पहाड़ से लेकर मैदान तक हर सीट पर टक्कर बराबर की देख कुछ कांग्रेसी मीडिया मैनेजरों को शायद लगने लगा था कि पार्टी जीत की ओर आसानी से बढ़ रही है , लिहाज़ा मीडिया के फंड को डकारने में कोई समस्या और कोई हर्ज़ नहीं है। बस यहीं से मीडिया के नाम पर बजट को ठिकाने लगाने का पूरा तानाबाना कांग्रेस भवन के बाहर एक ख़ास लोकेशन पर चंद लोगों के बीच बुना गया जिसके चर्चे अब सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं।

चुनाव में मीडिया मैनेजमेंट यूं तो कोई नई बात नहीं है। पार्टी अपने स्तर से हो या उम्मीदवार अपने निजी संबंधों और टीम के साथ मीडिया के साथ तालमेल बनाते हैं। चुनाव के चंद दिनों पहले प्रचार प्रसार जब जोरों पर होता है और प्रेस कॉन्फ्रेंस , नुक्कड़ सभाएं , रैलियां और मीटिंग या फिर व्यक्तिगत साक्षात्कार को कवर किया जाता है तो नेता या उम्मीदवार के निजी सम्बन्ध उसका मैनेजमेंट और बजट अहम रोल निभाता है।

2022 की विधानसभा चुनाव में देहरादून में मौजूद कांग्रेस भवन में भी यही कोशिश की जाती तो बेहतर होता। लेकिन जिस तरह से बीते कुछ दिनों में कांग्रेस के अंदर से कांग्रेस के ही नेताओं द्वारा पार्टी फंड और मीडिया मैनेजमेंट के लिए निर्धारित बजट के बंदरबांट की खबरें सामने आ रही है उससे लगता है कि अगर पार्टी आलाकमान जांच कराये तो कोई बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। जिसमें पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि चंद लोगों की जेब में डाल दिया गया पार्टी का फंड पकड़ में आ सकता है।

2022 के चुनाव को भारतीय जनता पार्टी जहां एक प्रोफेशनल मैनेजमेंट के तौर पर एक टीम के साथ लड़ने के लिए मैदान में योजना बनाकर काम कर रही थी तो वही देहरादून में कांग्रेस भवन के अंदर एक ” खास गैंग ” चंद पत्रकार और कुछ विज्ञापन एजेंसियां अलग ही खेल या यूं कहें षड्यंत्र रचा रही थी।

हैरानी इस बात की है कि प्रदेश के कुछ गिने-चुने कांग्रेसी भी इस खेल से भली भांति वाकिफ थे लेकिन किन्हीं खास वजह से उन्होंने भी कान और आंख बंद कर लिए थे। मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर जिस तरह से इस तथाकथित खेल का अंदेशा जताया जा रहा है उससे लगता है कि कांग्रेस चुनाव हारी तो इसकी वजह मतदाता से ज्यादा ऐसे निजी स्वार्थ में लिप्त पार्टी के तथाकथित नेता है जिन्हें चुनाव कमाई का एक अवसर लगता है। जिन्हें पार्टी का फंड घोटाले के लिए मुफीद नजर आता है और पार्टी हित से पहले वो निजी हितों को साधने लगते हैं।

उत्तराखंड के पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में कानाफूसी सुनाई दे रही है और सूत्र भी बताते हैं कि प्रदेश भर में चुनावी होर्डिंग्स , पोस्टर , पम्पलेट , बुकलेट और प्रेस मीट के आयोजन से लेकर विज्ञापन जारी करने में दिल खोल कर गड़बड़झाला हो सकता है। हांलाकि इस दौरान प्रादेशिक चैनलों और सोशल मीडिया के गिने चुने कृपा पात्र पत्रकारों को मीडिया मैनेजरों ने विज्ञापन जारी किया। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद उनके भुगतान भी अभी तक नहीं हो सके है। सूत्र बताते हैं कि पार्टी में बाकायदा इसके लिए मोटे बजट की व्यवस्था पहले ही कर दी गयी थी।

ऐसा भी नहीं है कि कुछ मीडिया संस्थान , सोशल मीडिया , पोर्टल और अखबारों के पत्रकार कांग्रेस के इन तथाकथित मीडिया मैनेजरों की कृपा के पात्र नहीं बने हों .अंदरखाने खबर है कि कुछ खास पत्रकारों को भरोसे में लेकर पार्टी नेताओं के प्रचार प्रसार का जिम्मा संभाल रहे इन लोकल मीडिया प्रभारियों , प्रवक्ताओं और दरबारियों ने सैकड़ों फ़र्ज़ी और बेअसर संस्थानों के नाम के सामने भी मोटी रकम दर्ज़ कर खर्च का हिसाब किताब ठिकाने लगा दिया है।

इस खबर में विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त इनपुट्स के साथ साथ सोशल मीडिया प्लेटफ़र्म पर तैर रहे उन ज्यादातर बयानों को भी आधार बनाया गया है,जिन्हे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के दिल का दर्द कहा जा सकता है और पत्रकारों का लंबा अनुभव इसमें झलकता है ।

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