आयरन लेडी इंदिरा हृदयेश का सपना रह गया अधूरा, निधन से एक दिन पहले कही थी ये बात

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80 साल की इंदिरा ह्रदयेश का एक लंबा राजनीतिक जीवन रहा.

80 साल की इंदिरा ह्रदयेश का एक लंबा राजनीतिक जीवन रहा.

इंदिरा ह्रदयेश (Indira Hridayesh) दिल्ली में कांग्रेस संगठन की बैठक में शामिल होने दिल्ली आई थीं. रविवार सुबह को ही उनकी तबियत अचानक से ज्यादा खराब हो गई. कुछ समय पहले हीं वो कोरोना से ठीक हुई थीं.

देहरादून. उतराखंड (Uttarakhand) की आयरन लेडी इंदिरा हृदयेश (Iron Lady Indira Hridayesh) के निधन के साथ ही उनका सपना (Dream) भी अधूरा रह गया.  उतराखंड में होने वाले चुनाव में चुनाव लड़ने का उनका सपना था. कहते हैं जब कोई सपना अधूरा रह जाए तो तकलीफ़ होती है. लेकिन अगर वो सपना देखने वाला अपने सपने के साथ इस दुनिया से ही चला जाए तो तकलीफ़ और जयदा बढ़ जाती है.  इंदिरा हृदयेश के साथ भी यही हुआ. उन्होंने अपनी मौत के एक दिन पहले न्यूज़ 18 को अपने exclusive इंटर्व्यू में कहा था कि अभी तो मैं चुनाव लड़ना चाहती हूं. उन्होंने कहा था कि चुनाव लड़ूंगी भी और उसी की तैयारी कर रही हूं. दिल्ली बैठक के लिए आयी हूं. लेकिन क्या पता था किसी को कि ये उनकी आख़िरी बैठक और आख़िरी दिल्ली दौरा रह जाएगा. दिल्ली से लेकर उतराखंड तक लोग सदमे में है. उनकी आवाज़ को सुनकर लोग एक साथ नज़र आते थे. वो एक ऊर्जावान नेता के साथ-साथ मिलनसार महिला भी थीं . सबको एक साथ लेकर चलने में उनका हुनर था. अब जब वो नहीं है तो उनके साथ उनके सपने भी अधूरे रह गए, जिसका अफ़सोस पूरे उतराखंड को है.

नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश की मौत के बाद उनका पार्थिव शरीर को रानीबाग स्थित चित्रशाला घाट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.  इंदिरा हृदयेश के छोटे बेटे एवं कांग्रेस नेता सुमित ह्रदयेश ने नेता प्रतिपक्ष की चीता को मुखाग्नि दी. इस दौरान वहां मौजूद हजारों की संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों का जमावड़ा लगा रहा. सभी की आंखें इस दौरान नम हो गई थीं. इंदिरा ह्रदयेश के अंतिम संस्कार के समय पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, प्रभारी देवेंद्र यादव, राज्य के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य व उनके पुत्र विधायक संजीव आर्य सहित कांग्रेस पार्टी के कई अन्य विधायक मौजूद थे. इस दौरान इंदिरा ह्रदयेश अमर रहे के नारों से पूरा चित्रशिला घाट गूंज उठा. सभी की आंखें नम थीं और सभी के चेहरे पर एक अलग तरह की बेचैनी सी थी की आखिर उनकी नेता प्रतिपक्ष इंदिरा ह्रदयेश कहां चली गईं. सभी ने इंदिरा ह्रदयेश के किए गए कार्यों को याद करते हुए उनके अधूरे सपने को पूरा करने का संकल्प लिया.

कोविड को दी थी मात

इंदिरा ह्रदयेश दिल्ली में कांग्रेस संगठन की बैठक में शामिल होने दिल्ली आई थीं. रविवार सुबह को ही उनकी तबियत अचानक से ज्यादा खराब हो गई. कुछ समय पहले हीं वो कोरोना से ठीक हुई थीं. इसके साथ ही उनकी हार्ट सर्जरी भी हुई थी.  कोविड को तो मात देकर वो ठीक हो गयी लेकिन हार्ट अटेक को वो सहन नही क़र पायीं और उनकी मौत हो गयी.इंदिरा ह्रदयेश का राजनीति सफ़र

80 साल की इंदिरा ह्रदयेश का एक लंबा राजनीतिक जीवन रहा. वह 1974 में पहली बार अविभाजित उत्तर प्रदेश के लिए विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं और फिर लगातार चार बाद इसकी सदस्य रहीं. दिवंगत मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के करीबी लोगों में शामिल इंदिरा को उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस का दिग्गज नेता माना जाता था. राज्य बनने के बाद जब पहली बार 2002 में विधानसभा चुनाव हुए तो वह हल्द्वानी से विधायक रहीं और तब से वह केवल एक बार यहां से चुनाव नहीं जीत सकी.

 तिवारी और हरीश रावत के कार्यकाल में रहीं कैबिनेट मंत्री

जब-जब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार रही, इंदिरा ह्रदयेश कैबिनेट मंत्री रहीं. एनडी तिवारी सरकार में उनका दबदबा ऐसा था कि उन्हें सुपर मुख्यमंत्री तक कहा जाता था. लोकनिर्माण विभाग, संसदीय कार्य मंत्री, वित्त मंत्री जैसे अहम विभागों की मंत्री रहीं. एनडी तिवारी, विजय बहुगुणा और हरीश रावत,तीनों के ही मुख्यमंत्री काल के दौरान उनके अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी रही. कांग्रेस में कलह के दौरान उन्हें मुख्यमंत्री तक बनाने की बात कही गई थी.





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